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लीला की लीला

Antarvasna प्रिय पाठको, आशा करती हूं कि आप लोग मेरी कामुक गाथा के पहले २ भागों को पढ़ चुके होंगे। अब मैं उसी के तीसरे भाग के साथ आपके सम्मुख फिर हाजिर हूं। पहले भाग में आप लोगों नें पढ़ा कि किस तरह एक अजनबी खड़ूस बूढ़े नें मेरा कौमार्य तार तार किया।

दूसरे भाग में आप नें देखा कि किस तरह मेरे दादाजी के साथ मिल कर बूढ़े नें मुझे अत्यंत उत्तेजक ढंग और हर संभावित तरीके से वासना का नंगा नाच और कामुकता के सैलाब में गोते खिला कर अपनी काम पिपाशा शांत की और मुझे कामक्रीड़ा के चरम आनंद से परिचित कराया।

मुझ नादान अर्द्धविकसित कली को न सिर्फ एक पूर्ण विकसित फूल में परिणत कर दिया बल्कि निहायत बेहयाई से रतिक्रिया के पूर्ण आनंद लेने का गुर भी बता दिया। मुझे उन दोनों बूढ़ों नें अपनी काम क्रीड़ा से ऐसा आनंद प्रदान किया कि मैं उनकी दीवानी हो गई।
मुझ बेचारी उपेक्षा की मारी नादान बालिका को उन्होंने भले ही अपनी हवस का शिकार बनाया हो, लेकिन जिस तरह उन्होंने मुझे तवज्जो दी, मेरी ओर आकर्षित हुए, भले ही अपनी कुत्सित काम क्षुधा की तृप्ति के लिए जिस तरह मुझ पर निछावर हुए,

यह मेरे अंदर की हीन भावना को दूर करने में बहुत सहायक हुआ। मेरे अंदर जैसे नवजीवन का संचार हो गया। मेरे अंदर ऩये आत्मविश्वास का संचार हो गया। मेरा तन, रोम रोम अद्भुत आनंद का रसास्वादन कर मानो हवा में उड़ रहा था।
तन में नवस्फूर्ति का संचार हो रहा था। मैं उनके इस “अहसान” के प्रत्युत्तर में उनपर अपना भरपूर प्यार लुटाने की ख्वाहिशमंद थी, भले ही उनकी नजरों में प्यार, स्नेह की परिभाषा तन की वासनापूर्ति हो,

मगर उनकी चुदाई में मैंने उनके अपनेपन को अनुभव किया, यह और बात है कि उनका अंदाज ठेठ गंवई था। मैं महसूस कर सकती थी कि उन काम वासना के भूखे बूढ़े भी आत्मीयता के भूखे थे। बुढ़ापे के कारण वे भी उपेक्षित और अकेलेपन के दंश के साथ जीने को मजबूर थे।

जिस तरह उन्होंने मेरे आत्मविश्वास को जगाकर नया जीवन दिया ठीक उसी तरह मैं नें भी उनके सूने जीवन के अस्ताचल में उनके सूनेपन को अपने प्रयासों से दूर करने का निश्चय किया। उनके बेरंग जीवन में रंग भरने का निर्णय किया और उसे कार्य रूप देने हेतु योजना बनाने लगी।
इस शुभ कार्य का शुभारंभ मैं आज से ही करना चाहती और इस के लिए उत्तम अवसर भी मिल गया। संध्या ६:३० बजे दादाजी नें मां बाबूजी से कहकर दादाजी उस बूढ़े के साथ मुझे बाजार ले गए। हम नें एक टैक्सी में बाजार तक का सफर तय किया।

घर से बाजार तक का सफर आधे घंटे का था। मैं दादाजी और बूढ़े के बीच सैंडविच बनी पिछली सीट पर बैठी थी। दोनों मुझसे बिल्कुल चिपक कर बैठे थे। कभी मेरी चूची छू कर मेरे कान में फुसफुसाते,

“मां दूध पिलाओ ना” और मैं भी किसी ममतामयी महिला की तरह बनावटी गुस्से से फुसफुसा कर डांटती, “चुप शैतान”। कभी मेरी गुदाज जंघाओं को सहलाते हुए कहते, ” मां मुझे गोद में ले लो ना” और मैं बड़े ठसके में मादक अदा से उनके गाल पर हलके से चपत लगाती और कहती, ” बदमाश कहीं के, इतने बड़े होकर भी मां की गोद में बैठोगे? चुप बैठो।
हमारे बीच एक अंतरंग नजदीकी रिश्ता कायम हो चुका था। मुझे उनकी चुहलबाजियों से मजा आ रहा था और साथ ही साथ उन पर बड़ा लाड़ आ रहा था।

कभी मेरे हाथ अपने खड़े लंड पर रख देते और कहते, ” मां यहां देख ना यहां क्या हो गया है?” और मैं झिड़कते हुए कहती, ” बेशरम, अब बदमाशी करोगे तो मुझसे पिटोगे।” और उनके कान खींचती। हम इस बात से बेखबर थे कि करीब 50 – 55 साल का वह काला कलूटा, दुबला पतला, लंबोतरा चेहरा और लंबी तोते जैसी नाक, बेतरतीब बाल और लंबी सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा टैक्सी ड्राईवर आईने में हमारी हरकतों को देख देख कर मुस्कुरा रहा था और हम इसी तरह चुहलबाजी करते बाजार पहुंचे ।
टैक्सी से उतरते समय उस ड्राईवर से रहा नहीं गया और फटे बांस सी आवाज में बोल बैठा, ” बहुत भाग्यवान हैं आपलोग, काश मेरी भी कोई ऐसी बिटिया होती।” हाय मैं तो शरम से पानी पानी हो गई।

दादाजी मुस्कुरा कर बोले, ” यह हमारी बिटिया नहीं मां है मां।” मैं समझ रही थी और मेरे रसिया बूढ़े भी समझ रहे थे कि मैं उनकी किस तरह की मां हूं, मां या माल। फिर टैक्सी भाड़ा देने के लिए पैसे निकालने लगे। मैंने टैक्सी ड्राईवर की आंखों में अपने लिए हवस भरी कातर याचना को पढ़ लिया।
मैं रोमांचित हो गयी, समझ गयी कि मुझ जैसी लड़की के लिए दुनिया में ऐसे हवश के पुजारी खड़ूसों की कमी नहीं है। बस जरूरत है तो बुद्धिमानीपूर्वक उनकी इस कमजोरी का इस्तेमाल बड़ी चतुराई से अपने यौवन का आनंद प्राप्त किया जाय। मैं उसकी लार टपकाती कातर याचना भरी निगाहों से,

जो कि मेरे वस्त्रों को भेदती हुई मेरे तन के प्रत्येक उठान और गहराईयों में चिपकी हुई टटोल रही थी, रोमांचित भी हुई और उसकी याचनापूर्ण निगाहों से द्रवित भी। आंखों के इशारे से उसे आश्वस्त किया कि मैं नें उसकी याचना को समझ लिया है और जल्द ही हमारी “मुलाकात” होने वाली है। चुपके से एक पुर्जी पर मेरा नंबर लिख कर उसकी ओर उछाल दिया।
फिर हमलोग शॉपिंग मॉल में गए और दादाजी नें अपने पसंद से मेरे लिए नये कपड़े पसंद खरीदा। मैंने बताया कि मेरी चूचियां सूज कर थोड़ी बड़ी हो गयी हैं इस लिए एक साईज बड़ा ब्रा खरीदवाया।

मैंने भी बूढ़े और दादाजी के लिए मेरी पसंद के अऩुसार कपड़े खरीदने को मजबूर किया। ढंग के शर्ट और पतलून, उन्हें पहना कर ट्राई किया और जो कपड़े उनपर फब रहे थे वही खरीदवाया। उनके बाल और दाढ़ी करीने से सेट करवाया। उनके लिए टूथब्रश खरीदवाया और कहा कि अब से रोज सुबह शाम ब्रश करें नहीं तो मैं उन्हें अपने पास भी आने नही दूंगी।

अच्छी क्वालिटी का बॉडी स्प्रे खरीदवाया। मैं उनका कायाकल्प कर देना चाहती थी। दोनों बूढ़े आज्ञाकारी बच्चों की तरह मेरी हर हर बात मान रहे थे।
तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब दो घंटे बाद हम शौपिंग कर के बाहर निकले, वह बूढ़ा टैक्सी वाला वहीं हमारा इंतजार करता मिला। बूढ़े टैक्सी वाले नें आग्रह पूर्वक अपनी ही टैक्सी में घर तक छोड़ने की पेशकश की और मेरे दादाजी कह उठे, “का बात है रे? इत्ती देर से हमरा ही इंतजार कर रहे थे का?
वह टैक्सी वाला बूढ़ा झेंपता हुआ बोला, “हां बाबूजी, आईए ना”
फिर हम उसी टैक्सी से घर वापस आ गये। दादाजी भाड़ा देने लगे तो टैक्सी वाला बूढ़ा भाड़ा देने से मना कर दिया और बोला, ” काहे शर्मिंदा कर रहे हैं साहब, आप लोगों की मां मेरी भी मां (माल) समान है। आप लोगों से क्या भाड़ा लेना। कभी भी जरूरत पड़े मुझे याद कर लीजिएगा, मैं हाज़िर हो जाऊंगा।” कहते हुए उसकी बड़ी हसरत भरी निगाहें मेरे यौवन पर चिपकी हुई थी।

मैं ने हौले से उसके आमंत्रण भरी निगाहों के प्रत्युत्तर में मेरे बूढ़े आशिकों की नजर बचा कर हल्की मुस्कान के साथ मूक स्वीकृति जता दी। ड्राईवर का तो खुशी से चेहरा खिल उठा। उसके पास वैसे भी मेरा नंबर पहुंच चुका था।
फिर हम लोग जैसे ही घर में प्रविष्ट हुए, सब भौंचक आंखें फाड़े हमें देख रहे थे। मेरे बूढ़े आशिकों का कायाकल्पित रूप देख कर सब घरवाले चकित भी थे और प्रसन्न भी। मेरे नानाजी तो बेसाख्ता बोल उठे, “वाह समधी जी, ई तो कमाल हो गया। एकदम से स्मार्ट लग रहे हो।”

“अरे सब ई हमरी बिटिया का करा धरा है। ” दादाजी झेंपते हुए कह उठे। फिर नानाजी मेरी ओर मुखातिब हुए और बोले, “वाह री जादुगरनी।” बूढ़े आशिकों के अभूतपूर्व आनंदमय कृत्य का रसास्वादन कर मेरे निखरे स्वरूप पर बुलडोग जैसी सूरत वाले नानाजी की निगाहें टिक गयीं। उनकी निगाहों में मैं ने जो कुछ देखा उसमें मुझे अपने लिए प्रशंसा मिस्रित भूख स्पष्ट लक्षित हो रही थी।

मैं पल भर के लिए हत्प्रभ रह गई थी, दादाजी की बातों से मेरा ध्यान भंग हुआ |
“अरे समधी जी, अब बिटिया पर ही नजरें गड़ाए खड़े रहोगे क्या? चल अंदर,” बोलते हुए नानाजी की बांह पकड़ कर उसे दूसरे बूढ़े के साथ उस कमरे में गये जहां ये ठहरे हुए थे। मैं तुरंत अपने कमरे में आई और बेड पर पसर गयी। मेरे जेहन में नानाजी और टैक्सी ड्राइवर का चेहरा बार बार कौंध रहा था।

दोनों की नजरों में क्या फर्क था? मुझ अव्यस्क कली से अपनी हवस मिटाने वाले दादाजी और उनके बूढ़े सहयोगी, जो कि दूर के रिश्ते में दादाजी के बड़े भाई, अर्थात मेरे बड़े दादाजी से भिन्न तो कत्तई नहीं थे।
नानाजी 62 साल के ठिंगने, करीब 5′ के भैंस जैसे मोटू तोंदियल, गंजे व्यक्तित्व के स्वामी थे। भरे भरे गोल बुलडोग जैसे चेहरे में छोटी छोटी मिची मिची आंखें और पकौड़े जैसी नाक, चौड़ा बड़ा सा मुंह और मोटे मोटे होंठ बाहर की ओर थूंथने की तरह उभरे हुए, बड़े बड़े कानों पर लंबे लंबे सफेद बाल, कुल मिलाकर निहायत ही अनाकर्षक और भोंड़े।

नानाजी पिछले 7 साल से विधुर की जिंदगी जी रहे थे। मेरी मां के अलावा दो और शादीशुदा बेटियां थीं, जिनकी विदाई के बाद गांव में अकेले ही मजदूरों के भरोसे खेती बारी का काम देखते थे।

बड़ी सी हवेली में अकेले नौकरों के भरोसे रह रहे थे। और 2 दिन बाद उनको गांव लौटना था।
ड्राईवर और नानाजी और उनकी भेदती नज़रें बार बार मेरे जेहन में अनचाहे पैठ बनाती जा रही थी। मैं हैरान थी कि यह मुझे हो क्या रहा है। आगे और मैं क्या कर बैठूंगी या मेरी नियति क्या है, इन बातों से बेखबर कब मेरी आंख लगी मुझे पता नहीं।
करीब एक घंटे पसर कर सोई और जब आंख खुली तो देखा 8 बज रहे थे।
जब मैं कमरे से बाहर निकली, देखा कि नानाजी के साथ दोनों बूढ़े ड्राइंग हाल के कोने वाले सोफे पर बैठ कर न जाने क्या खुसर पुसर कर रहे थे। ज्यों ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी, चुप हो गये और मुस्कुराने लगे। नानाजी की नजरों में मैं अपने लिए वही परिचित हवस की भूख से लार टपकती स्पष्ट देख रही थी।

मैं समझ गयी कि दादाजी और बड़े दादाजी ने नानाजी को भी हमारे बीच हुए गरमागरम कामक्रीड़ा का राजदार बना लिया है। नानाजी की गंदी हवस भरी कामलोलुप दृष्टि को देख मैं सहम गई।
इतने में “चल बिटिया बाहर बगीचे में थोड़ा टहल लिया जाय।” कहते हुए दादाजी खड़े हुए और साथ ही दोनों बूढ़े भी और मैं असमंजस में उनके साथ खिंची बाहर बगीचे में आ गयी। पहले दादाजी आश्वस्त हुए कि यहां एकांत है, फिर एक किनारे बेंच पर बैठे और मुझे भी हाथ पकड़ कर अपने और नानाजी के बीच बैठा लिया, एक किनारे बड़े दादाजी बैठे थे।
मेरे करीब आ कर धीरे से बोले, ” बिटिया, आज तोहरा नानाजी पर भी थोड़ा मेहरबानी कर दे। आपन जोबन के रस तनी सा चखा दे। बेचारा बहुत दिन से भूखा है।” मैं गनगना उठी। क्या उत्तर दूं समझ नहीं पा रही थी, अवाक रह गयी, इतने नंगे प्रस्ताव पर।
अंततः बमुश्किल बोली, ” ना बाबा ना, नानाजी के साथ भी? हाय राम। आप बड़े गंदे हो दादाजी। नानाजी को भी बता दिए।”

“अरे का हुआ?” अब नानाजी के थूथन से बोल फूटा। “हम पर भी तनिक कृपा कर दे ना बिटिया। तुमरा बड़ा अहसान होगा हम पर” एकदम बेचारगी से गिड़गिड़ा उठा।
मैं समझ गई कि मैं फंस चुकी हूं। इनको मना करना मुझे मुश्किल होगा क्योंकि ये सभी हमारे बीच हुए काम वासना के खेल से स्थापित नाजायज अंतरंग सम्बन्ध के राजदार हैं।
नानाजी के साथ फिर वही वासना का नंगा नाच नाचने को मजबूर थी, इनकार करने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। मैंने नजरें जमीन पर गड़ा कर डूबती आवाज में कहा, “ठीक है आज रात को जब सब सो जाएंगे, चुपके से मेरे कमरे में आ जाइएगा। मैं दरवाजा अंदर से बंद नहीं रखूंगी।
मैं नानाजी जैसे भोंड़ी सूरत वाले गंजे, मोटे, तोंदियल, ठिंगने, निहायत ही अनाकर्षक व्यक्ति की हवस मिटाने को मानसिक रूप से अपने को तैयार करने लगी। उद्विग्न मन को बमुश्किल शांत और कड़ा कर के मैं अपने मन को तसल्ली देने लगी कि चलो इस बूढ़े की भी सालों से भूखी कामेच्छा शांत करने को अपना तन परोस कर निपटा दिया जाय,

आखिर दो खूसट बूढ़े मेरी कमसिन जवानी का भोग लगा ही चुके हैं, एक और सही। मेरा मन अब भी नानाजी के बेढब रूप और शरीर के साथ कामक्रीड़ा और संभोग की कल्पना मात्र से सिहर रहा था, मगर मैं मजबूर थी।
मैं ने एक नजर नानाजी की ओर देखा, वे मुझे एकटक किसी भूखे वहशी भेड़िए की तरह ऐसे घूर रहे थे मानों उनके सामने कोई स्वादिष्ट शिकार बैठी हो। ऐसा लग रहा था मानो उनका वश चलता तो वहीं मुझपर झपट कर भंभोड़ना शुरु कर देते। मैं ने झट से अपनी नजरें हटा ली, धीरे से उठी और भारी कदमों से अपने कमरे का रुख किया।
रात्रि भोजन के दौरान नानाजी से नजरें चुराती रही जबकि नानाजी की वासनापूर्नण नजरें निरंतर मेरे चेहरे और सीने के उभारों पर ही केन्द्रित थीं। मैं तुरंत फुरत खाना खा कर उठ गई और बिना किसी से कुछ बोले अपने कमरे में आ गयी।
“आज इस लड़की को क्या हो गया है? चुपचाप खाना खा कर तुरंत अपने कमरे में चली गई?” मां बोल उठी, “बाजार जा कर खूब घूमे होंगे आप लोग, थक गयी होगी।
“हां बहु, लगता है बहुत थक गयी होगी बेचारी” दादाजी बोल उठे। फिर करीब दस बजे सब अपने आपने कमरों में सोने चले गये। इधर मुझसे नींद कोसों दूर थी। मैं धड़कते दिल से बिस्तर पर लेटी नानाजी जैसे बेढब, वीभस्त बूढ़े के साथ होने वाले कामलीला की कल्पना में डूबी, घबराहट से दिल बैठा जा रहा था फिर भी इंतजार कर रही थी।

सेकेंड, मिनट, घंटा बीतता गया, अबतक मेरे अंदर घबराहट के साथ साथ रोमांच भी सर उठाने लगा था। मैं सोचने लगी, फंस तो चुकी हूं, चलो अब जो होना है देखा जाएगा।
ठीक बारह बजे हल्की सी आवाज से दरवाजा खुला और मैं ने देखा नानाजी दबे पांव प्रवेश कर रहे थे। मैं ने मेन लाईट बन्द कर सिर्फ नाईट बल्ब जला रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी और उनकी ओर देखने लगी, मद्धिम रोशनी में भी मैं उनके मोटे होंठों पर वासना से ओत प्रोत मुस्कान स्पष्ट देख सकती थी।

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आहिस्ते से दरवाजा बंद कर मेरे समीप आए और बड़ी बेताबी से अपनी बाहों में भींच कर बेहताशा चूमने लगे। उनके मुंह से अनजानी बदबूदार महक आ रही थी। जाहिर था कि वह कोई नशा करके मेरे पास आया था।
” हाय राम क्या पी कर आए हैं नानाजी?”” मैं बेसाख्ता बोल उठी और उनकी मजबूत पकड़ में कसमसा उठी, मगर वह मुझे मजबूती से जकड़ कर अपनी मनमानी किए जा रहा था।
“हां री मुनिया, इत्ते साल बाद एक तोहरी जैसी नयी नकोर लड़की से, जो कि हमरी नतनी भी है, ई सब करने के लिए थोड़ा हिम्मत ले के आया हूं, थोड़ा देसी दारू पी लिया हूं” नानाजी बोल उठे।
“छि गंदे, कितनी बदबू आ रही है।” मैं फुसफुसा उठी।
” अब का करें यही दारु मिला। विदेशी दारु इहां तो है नहीं, थोड़ा बर्दाश्त कर ले रानी।” नानाजी धीरे से बोले। उन्होंने मुझे बेदर्दी से दबोच कर पागलों की तरह चूमना चाटना शुरू कर दिया।

“ओह नाना आराम से, प्लीज, मैं कहां भागी जा रही हूं।” फुसफुसा रही थी, मेरी स्थिति जाल में फंसी चिड़िया की तरह हो रही थी। वह अपनी जीभ से, जो किसी कुत्ते की तरह लंबी थी, मेरे चेहरे को, गले को चपाचप चाटे जा रहा था। एक हाथ से मुझे जकड़ रखा था और दूसरे हाथ से मेरे अर्धविकसित चूचियों का मर्दन शुरू कर दिया।
मैं ने सिर्फ नाईटी पहनी हुई थी, ज्यों ही इसका आभास नानाजी को हुआ, उन्होंने एक झटके में मेरी नाईटी उतार फेंकी और लो, मेरा दपदपाता पूर्ण नग्न यौवन उनके सम्मुख प्रस्तुत था। हाय राम, मैं मारे शर्म के पानी पानी हो रही थी।
उनके लिए यह अद्भुत और अकल्पनीय दृष्य था। नानाजी अवाक रह गये, नजरें फटी की फटी रह गई, मुंह खुला का खुला रह गया। इतना चिकना, खूबसूरत, कमसिन और कामुक यौवन उनके सामने पड़ा था, उन्हें अपनी नजरों पर और अपनी किस्मत पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

चंद पलों बाद जैसे वे नींद से जागे और किसी भूखे जंगली कुत्ते की तरह टूट पड़ने को बेताब, आनन फानन अपना पजामा, जिसके सम्मुख विशाल तंबू बन चुका था, उतार फेंका और साथ ही अपना कुरता भी। अंदर उसने भी कुछ नहीं पहना था।
हे भगवान, उनका फनफनाता, फुंफकार मारता हुआ काले नाग की तरह लंबा लिंग (लन्ड अथवा लौड़ा) करीब 7″ और मोटा करीब 3,”, लंबे सफेद बालों से भरा, ऊपर नीचे हो कर मानो मेरे यौवन को सलामी दे रहा था। उनका काला, मोटा तोंदियल विकृत शरीर, गर्दन से नीचे पूरा सन जैसे सफ़ेद बालों से भरा हुआ किसी ठिगने राक्षस से कम नहीं लग रहा था। गजब स्थिति थी मेरी, किंकर्तव्यविमूढ़।

मैं जिस स्थिति में थी मना करने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। मैं पूर्णतय: नंगी और वह बूढ़ा दानव भी नंग धड़ंग मुझे झिंझोड़ डालने को बेताब।
फिर तो गजब ही हो गया, अपना गरमागरम (अब मैं भी थोड़ी बेशर्मी भरी भाषा का प्रयोग करूंगी, पाठक गण क्षमा करें) मूसलाकार लौड़ा मेरे हाथों में थमा कर बड़ी बेहयाई से नानाजी बोले, “ले रानी बिटिया हमार लन्ड के पकड़ और आपन मुंह में ले के चूस।” लन्ड क्या था बेलन था, सामने हल्का नुकीला, बीच में मोटा और फिर जड़ की तरफ पतला।
“नहीं नानाजी नहीं, प्लीज इसे मुंह में नहीं,” मैं घबराकर बोली।
“चल साली हरामजादी बुरचोदी कुतिया चूस। हमको सब पता है नखरा न कर।” गुर्रा कर नानाजी बोले। फिर जबरदस्ती मेरे मुंह में अपना फनफनाता लन्ड घुसेड़ने लगे। मैं नें अनिच्छा से उनका विकराल लंड प्रवेश के लिए ज्योंहि मुंह खोला, भक्क से नानाजी नें लौड़ा जबरदस्ती मेरे हलक में ठेल दिया।
अब वे पूरे वहशी जानवर बन चुके थे और मेरे मुंह से निकलने वाली गों गों की आवाज की परवाह किए बिना एक धक्का और दे कर पूरा लंड मेरे हलक में उतार दिया। मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। फिर धीरे से बाहर निकाल कर भक्क से अंदर ठेला और यह क्रम 5 मिनट तक जारी रखा।
पूरे 5 मिनट मेरे मुंह की चुदाई किया और मेरे लार से लसलसे लंड को मुंह से बाहर निकाला। मेरा मुंह दर्द करने लगा था। मैं ने राहत की लंबी सांस ली। मगर हे भगवान! नानाजी का लंड अब पहले से लंबा करीब 9″ का हो चुका था और मोटा भी करीब 4″ बिल्कुल गधे के लंड जैसा। घबराहट से मेरा बुरा हाल हो गया। “हाय मां इतना बड़ा! मैं मर जाऊंगी नानाजी।” मैं घबराकर बोली।
“तू नहीं मरेगी रे, चुपचाप देखती जा, खूब मज़ा दूंगा रानी।” अब वह मेरी चुचियों को अपनी लंबी खुरदुरी जीभ से कुत्ते की तरह चाटना शुरू किया। यह अत्यंत रोमांचक था, “आह ओह” मेरे मुंह से निकलने लगा क्योंकि अब मैं भी उत्तेजित हो रही थी।
“उफ्फ” उसके चाटने का अंदाज इतना उत्तेजक था कि उत्तेजना के मारे मेरी चूचियां तन गई ं और चूचक उत्तेजक अंदाज में बाहर की ओर खड़ी हो गई थीं। बदन उत्तेजना के मारे थरथरा रहा था। मेरी चूत गीली हो गई थी।

चाटते चाटते वह बूढ़ा चूचियों से नीचे पेट फिर नाभी और फिर मेरी चूत तक जा पहुंचा। “ओह मां” अद्भुत अहसास। 5 मिनट की इस क्रिया में मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुंच गयी। जैसे ही मेरी चूत में उनके लंबे खुरदुरे जीभ का स्पर्श हुआ मेरा पूरा शरीर कांपने लगा,

और मैं छरछरा कर झड़ने लगी। “आआआआह, ऊऊऊऊऊऊऊऊ अम्म्म्म्म्माआआआआ, नानाजी, मैं गई््ई् ््ई्।” फिर मैं निढाल हो गई। अद्भुत आनंद।
मगर नानाजी लगे रहे, पूरे चूत को चाटते रहे, चूत में लंबी जीभ घुसा कर घुमा घुमाकर चाटते रहे। धीरे धीरे मैं फिर उत्तेजित होने लगी और कुछ ही मिनटों में मेरे अंदर फिर कमाग्नि की ज्वाला धधक उठी।
नानाजी ने माहिर खिलाड़ी की तरह मेरी चुदासी स्थिति को भांप लिया और बोले, ” चल अब हम तोहार बुर में लौड़ा पेलब, तैयार हो जा।”

मैं ने उनके लंड के स्वागत में झट से पैर फैला दिए यह सोचे बगैर कि इनका दानवी लंड मेरी चूत का क्या हस्र करेगा।

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“अईसे नहीं रे बुरचोदी, तू हमरी कुतिया बन जा,” कहते हुए मुझे पलट दिया और घुटनों और हाथों के बल चौपाया बना कर किसी कुत्ते की तरह मेरे पीछे आए। मेरी गोल गोल गांड़ से ठीक नीचे अपने गधे लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के मुहाने पर दो तीन पल रगड़ा और फिर मेरी चूत रस से गीली चिकनी फकफकाती बुर के छेद पर टिकाया और बिना किसी पूर्व चेतावनी के एक करारा प्रहार कर दिया। ” ले हमार लौड़ा, हुम्म्म”
मैं अचानक हुए इस हमले से सम्भल नहीं पाई और मुंह के बल बिस्तर पर गिर पड़ी जिससे मेरी गांड़ उठ कर चूत को चुदने के लिए और सहूलियत भरा पोजीशन मुहैया हो गया। “हुम्म्माआह हाय हाय मार डाला नानाजी” नुकीला सुपाड़ा सरसराता हुआ एक झटके में मेरी चूत में अंदर घुसता चला गया और उसके पीछे मोटा हिस्सा भी पूरा का पूरा घुस कर कस गया।

मेरे मुंह से आह निकल गई। लंड के बीच का हिस्सा जो अब तक करीब ४” का हो चुका था, मेरी चूत को अपनी सीमा से बाहर फैला कर घुसा था, अतः दर्द से मेरा बुरा हाल हो रहा था। मेरी हालत भांप कर कुछ पल नानाजी रुके। “अहा, मस्त टाईट बूर है रे तुमरा, आह हमर चूतमरानी” ।
मेरी चूत का मुंह उनके लंड के पिछले हिस्से पर कस गया था जो अपेक्षाकृत मोटे हिस्से से काफी पतला था। कुछ पल में ही दर्द छूमंतर हो गया और मैं उनके विकराल लौड़े को आराम से अपनी चूत में समा कर अंद्भुत आनंद का अनुभव कर रही थी। मगर वासना के भूखे वहशी नानाजी की भूख तो और बढ़ गई थी।
पीछे से मेरी दोनों चूचियों को कस कस के दबा रहे थे और मुझे बिल्कुल पागलों की तरह उत्तेजित कर रहे थे। एकाएक भच्च से पूरा लंड निकाल कर भक्क से फिर ठोंक दिया। “उफ्फ” दर्द भी आनंद भी। फिर निकाला फिर ठोंका।

फिर तो क्रमवत ताल पे ताल धकाधक चोदने लगे। मैं दर्द भूल गयी और उस बदशक्ल बेढब बूढ़े के हाथों पूरी तरह समर्पित हो कर उनके अस्वभाविक गधे लंड से चुदती हुई नवीन रोमांचक अनुभव से दो चार होती हुई वासना के समुंदर में गोते खाने लगी।
“आह राजा, ओह मेरे चोदु नानाजी, मेरे प्यारे चुदक्कड़ स्वामीजी, आह चोद नतनीचोद,” और न जाने पागलों की तरह क्या क्या बड़बड़ाने लगी थी।

“हां रे बुर चोदी, हमर प्यारी कुत्ती, देख हम तुम्हरा कुत्ता, तुमको हमेशा अपना कुतिया बनाके चोदेगा। हुम हुम हुम हां हां हां हुम।” वह भी बड़बड़ कर रहा था।
धकाधक ठाप पे ठाप, धमाधम चोदने में मशगूल, कुत्ते की तरह हांफते हुए अंतहीन मशीनी अंदाज में चोदे जा रहा था चोदे जा रहा था और मैं उनके नीचे उनकी कुतिया बनी चुदे जा रही थी चुदे जा रही थी।
मैं फिर एक बार छरछरा के झड़ने लगी, “आआआआआआआआआआह अम्मा ऊऊऊऊऊऊऊऊ गई रे मां मैं गई।”
मगर नानाजी पर तो मानो चुदाई का भूत सवार हो गया था। वह लगा हुआ था धकाधक चोदने में। “ठहर रे तू मेरी बुर चोदी कुतिया, आज तुझे आईसा चोदेंगे कि तू हमेशा के लिए हमरी कुत्ती बन के रहना पसंद करेगी। ले खा हमरा लौड़ा अपना भोंसड़ा में हमरी चूतमरानी। ले हमार लौड़ा ले हरामजादी, हूं हूं और ले।” गंदी गंदी बातें बोले जा रहा था ठरकी बुढ़ऊ।
कुछ उनकी बातों का असर था और मेरी चूत की लगातार हो रही घमासान कुटाई का असर, देखते ही देखते कुछ ही देर में मैं फिर जोश में आ गयी और पीछे की ओर चूतड़ ढकेल ढकेल कर चुदवाने लगी। हमारे हांफने, बड़बड़ाने की आवाज से कमरा भरा हुआ था और बहुत ही कामुक माहौल बना हुआ था।
“हां चोद नतनीचोद हरामजादे, मुझे चोद चोद के अपनी रंडी बना ले मेरी चूत के रसिया, अपनी कुत्ती बना ले मेरे कुत्ते राजा, आह ओह उफ मादरचोद, आआआआह, मेरी बुर की कुटाई करके अपनी लंडरानी बना ले राजा, कूट राजा कूट, अपनी रंडी बना ले रे हरामी, आज से मुझे अपनी दासी बना ले रे मेरे बुढ़ऊ बलमा, आह चोदू, ओह मेरे बूर के मालिक”

मैं भी अब उत्तेजना के आवेग में बेहद बेशरम जंगली कुतिया बन कर दादाजी और बड़े दादाजी से सीखी और यहां वहां से सुनी बेहद नंगी गंदी गंदी गालियां मिश्रित बोली बोलने लगी थी।
करीब 45 मिनट चोदने के बाद नानाजी नें अचानक मुझे कस के दबोच लिया, लौड़ा पूरा मेरे अर्धविकसित बच्चेदानी तक घुसेड़ कर छर्र छर्र करके अपनें लौड़े का पानी गिराने लगा और इसी समय मैं भी तीसरी बार झड़ने लगी।

“अह ओह हां हां हम्फ” नानाजी के मुख से लंबी लंबी सांसें लेना और कुत्ते की तरह हांफना और मेरा ” हाय हाय मैं गयी रे मेरे चोदु बलम, मेरे प्यारे चुदक्कड़ कुत्ते, आआआआह” हम एक दूसरे से गुंथ गये और अनिर्वचनीय संतुष्टि के आनंद से सराबोर 2 मिनट तक वीर्य और चूतरस (अंडे) के मिलन का रोमांच का अनुभव करते रहे।

मुझे साफ़ साफ़ अनुभव हो रहा था गरमागरम वीर्य का सीधे मेरी बच्चेदानी में गिरना। मैं चरम सुख प्राप्त कर रही थी और अपने स्त्रीत्व का पूर्ण आनंद भी।
फिर हम निढाल हो कर बिस्तर पर गिर गये, मगर यह क्या! नानाजी का लंड अभी भी मेरी चूत में जड़ तक फंसा हुआ था। मुझे महसूस हो रहा था कि नानाजी का लंड के जड़ के ठीक आगे बड़ी सी गांठ बन कर मेरी चूत के अंदर फंस गयी है।

वह गांठ इतनी बड़ी थी कि मेरे चूत के मुंह से बाहर नहीं निकल पा रही थी। लंड निकालने की कोशिश में मैं आगे खिसकने लगी तो मेरी चूत फटने फटने को होने लगी और मैं दर्द से कराह उठी। “ओह मां ये क्या हो गया। मैं तो सच में कुत्ती की तरह तेरे के लंड से बंध गयी।”
“हां रे सच में हमरे में कुत्ता का गुण है। तू इसी तरह पड़ी रह, आधे घंटे में मेरा लौड़ा गांठ छोटा होगा तब लौड़ा बाहर आएगा।” बोलता हुआ आराम से लेटा रहा और इस दौरान अपने वीर्य का कतरा कतरा मेरे गर्भाशय में डाल कर जैसे मेरी चूत को अपने लंड से सील किए हुए था मानो वीर्य का एक बूंद भी बाहर निकल कर बर्बाद न हो पाए।

मैं निढाल हो कर बिस्तर पर उनके लंडपाश से बंधी लुढ़की पड़ी रही। करीब आधे घंटे बाद मैं ने महसूस किया कि गांठ छोटा हो रहा है और कुछ ही पलों में फच्च की आवाज से विकराल लंड बाहर निकल पड़ा। मैं ने राहत की लंबी सांस ली, चलो मुक्ति मिली।
मगर आज नानाजी ने अपने लंड का जो जौहर दिखाया, मैं तो सच में उनपर निछावर हो गई। उनका वह कुरुप व्यक्तित्व अब मुझे बहुत प्यारा लगने लगा था। मुझे अपनी काम कला और चोदन क्षमता से संपूर्ण और अकथनीय आनंद का प्रसाद चखा दिया।

“वाह रे मेरे चोदु सैंया, आखिर मुझे अपनी कुत्ती बना ही लिया।

मैं तेरी दासी बन गई राजा, तेरे लंड की पुजारन।” बोलती हुई उनके बेढब नंगे बदन से लिपट गई और उनके कुरुप चेहरे पर बेसाख्ता चुंबनों की झड़ी लगा बैठी और वह बूढ़ा जो मुझे चोद कर अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुका था, पूर्ण संतुष्ट भाव से मुस्कुरा रहा था।
“आज से तू हमारी कुतिया और हम तेरा कुत्ता, ठीक है ना?” नानाजी मुस्कुरा कर बोले और मैं इस बात पर मुस्कान के साथ उनकी छाती पर हौले से सर पटक कर बोली, “हां जी हां मेरे कुत्ते राजा, आज से मैं तेरी कुत्ती हो गई।”
उस समय रात के दो बज रहे थे। मैं ने न चाहते हुए भी नानाजी को समय दिखाया और कहा कि “अब आप यहां से जाईए मेरे प्यारे बुढ़ऊ चोदू लंडराजा” वे बड़ी ही अनिच्छा से उठे और अपने कपड़े पहन कर दबे पांव कमरे से बाहर निकल गये।

मैं भी अलसाई सी उठी और थके कदमों से दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया कि लड़खड़ा कर गिरते गिरते बची। पांव अभी भी थरथरा रहे थे और मेरी चूत में मीठा मीठा दर्द हो रहा था। मेरी चुत सूज कर कचौरी हो गयी थी।

बड़ी मुश्किल से दरवाजे तक गई और दरवाजा बंद कर वापस बिस्तर पर धम से गिर कर पसर गई और थकान के मारे पल भर में नींद के आगोश में चली गई।

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