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बुर की जरूरत

कुछ देर खामोश  रहने के बाद मम्मी ने जवाब दिया, ”बेटा ये जिस्म की जरूरत है, ये रिश्ते नाते सब भूल जाती है, तुझे तो पता ही है कि जब से तेरे पापा खतम हुए है, मेरी चूत में किसी का लण्ड नहीं गया, मैं अगर बाहर किसी गैर मर्द से चुदवाना शुरु कर देती तो कभी ना कभी सब को पता चल ही जाता, और फ़िर कितनी बदनामी होती, ये सब सोचकर ही मैंने निर्णय लिया कि क्यों ना विजय से ही अपने जिस्म की आग को बुझाया जाये, बात घर की घर में रहेगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा। जिस तरह से विजय रात को मेरे कपड़े उघाड़कर मेरे जिस्म के उन हिस्सों को देखकर अपना लण्ड हिलाता था, तो मेरी चूत में आग सी लग जाती थी, मुझे लगता क्यों ये अपना लण्ड हिला रहा है, क्यों नहीं इसको मेरी चूत में डालकर उसकी आग अपने लण्ड के पानी से बुझा देता।

तुझे याद होगा गुड़िया जब पापा के देहांत के बात हमने तुझे कुछ महीनों के लिये बुआ के घर भेज दिया था, ये उन दिनों की बात है।

गुड़िया बेटी तेरे पापा के देहांत के बाद, मैं तो किसी तरह संभल गयी थी, लेकिन घर परिवार की सारी जिम्मेदारी के बोझ के तले विजय मुर्झाता जा रहा था, जब भी एक माँ अपने बेटे की सूनी सूनी आँखें देखती तो उसका कलेजा गले को आ जाता। एक 18-19 साल के लड़के की मानो सारी दुनिया उजड़ गयी थी, उसके सारे सपने चकनाचूर हो गये थे। वो बहुत थोड़ा खाना खाता, उसकी आँखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी। उसने अपने दोस्तों के साथ घूमना फ़िरना छोड़ दिया था। वो उन दिनों बस कमरे में ही रहा करता था।

एक माँ कुछ दिनों तक इन्तजार करती रही कि समय विजय के दिल के घाव भर देगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिन पर दिन और हफ़्ते पर हफ़्ते बीतते जा रहे थे। मुझे पता था कि विजय उम्र के जिस दौर से गुजर रहा है, जरूर उसकी जिस्मानी जरूरतें भी होंगी। जो भी कारण हो जिस्मानी या मानसिक लेकिन एक बात निश्चित थी कि विजय डिप्रेशन में जा रहा था। मुझे पता था कि दिन भर वो बैड पर लेटा रहता और रात में मुट्ठ मार कर अपने बदन की गरमी को निकाला करता था, रात में मेरे सोने के बाद मेरे गुप्तांगों को देखकर या छूकर मुट्ठ मारते हुए मैं उसे बहुत बार देख चुकी थी, क्यों कि हम दोनों एक ही कमरे में सोया करते थे।

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मुझे पता था कि इस उम्र में लड़को के लिये मुट्ठ मारकर पानी निकालना नॉर्मल था, लेकिन तेरे पापा के गुजर जाने के बाद जिस तरह वो मेरे अंगों को देखकर मुठियाता था वो थोड़ा मुझे भी अजीब लगता था। वो मेरा पेटीकोट ऊपर कर के मेरी चूत को देखकर जब मुट्ठ मार रहा होता तो उसके कराहने में एक मजा आने की जगह एक अजीब सी कसक होती, जब वो पानी छोड़ने वाला होता तो वो आनंदित होने की जगह वो अंदर ही अंदर रो रहा होता।

एक रात मैं अधखुली आँखों से विजय को मुट्ठ मारते हुए देख रही थी, वो जमीन पर मेरे बगल में लेट कर मेरे ब्लाउज के बटन खोलकर मेरे मम्मों को देखकर मुठिया रहा था, और जब तक अपने लण्ड को हिलाता रहा, जब तक कि उसके लण्ड ने उसके पेट और छाती पर लावा नहीं उंडेल दिया, लेकिन वो फ़िर से अपने लण्ड को हिलाता रहा जब तक कि वो फ़िर से टाईट हिकर खड़ा नहीं हो गया, और वो फ़िर से जब तक मुट्ठ मारता रहा जब तक कि दोबारा उसके लण्ड ने पानी नहीं छोड़ दिया।

उसके बाद वो अपनी जगह जाकर सो गया, लेकिन मेरे दिमाग में उसके मुट्ठ मारने की तस्वीर ही घूम रही थी। ऐसा नहीं था कि मैंने विजय का औजार पहली बार देखा था, लेकिन पूरी तरह से खड़ा साफ़ साफ़ पहली बार ही देखा था, और पहली बार ही उसमें से वीर्य की धार निकलते हुए देखी थी। लेकिन जो कुछ विजय कर रहा था वो नैचुरल नहीं था, इस तरह वो अपना शरीर बर्बाद कर रहा था। वो अपने मन का गुबार बाहर निकालने के लिये हस्त मैथुन को इस्तेमाल कर रहा था। वो जबर्दस्ती मुट्ठ मार रहा था, और वो इसको एन्जॉय भी नहीं कर रहा था। मुझे लगा कि मुझे जल्द ही कुछ करना होगा, नहीं तो विजय अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेगा।

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