भाई की वासना -11

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हजरात आपने अभी तक पढ़ा..
फैजान को उस कपड़ों के ढेर में से सिर्फ़ एक ही काली रंग की ब्रेजियर मिली और वो उसे उठा कर मेरे पास ले आया और बोला- यह लो डार्लिंग..
मैंने ब्रेजियर ली और फैजान वापिस जा कर सोफे पर बैठ गया। जैसे ही वो वापिस गया तो मैंने उसे दोबारा बुलाया।

मैं- अरे यार यह क्या है… यार.. यह तो तुम जाहिरा की ब्रेजियर उठा ले आए हो.. मेरी लाओ ना निकाल कर.. तुमको पता नहीं चलता कि क्या.. कि यह कितनी छोटी है।
फैजान ने चौंक कर मेरी तरफ देखा और मैंने खुले दरवाजे से उसकी बहन की ब्रेजियर उसकी हाथ में पकड़ा दी।
फैजान ने एक नज़र मेरी नंगी चूचियों पर डाली और मैंने जानबूझ कर बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा बंद कर दिया ताकि वो मुझे ना देख सके… लेकिन मैं छुप कर उसे देखने लगी कि वो क्या करता है..?
अब आगे लुत्फ़ लें..

जैसे कि मुझे उम्मीद थी.. फैजान अपनी हाथ में पकड़ी हुई अपनी बहन की ब्रेजियर को देखने लगा। उसने वो ब्रा फैलाई और आहिस्ता आहिस्ता उसको फील करने लगा।
मेरी नज़रें उसकी चेहरे पर पड़ीं.. तो उसका चेहरा अजीब सा हो रहा था।

वापिस कपड़ों के तरफ जाते हुए उसने जो हरकत की.. उसे देख कर तो मेरी चूत ही गीली हो गई।
फैजान ने अपनी बहन की ब्रेजियर को अपनी चेहरे पर फेरा और उसे अपनी नाक से लगा कर सूंघा भी। हालांकि धुली हुई ब्रेजियर में से कहाँ उसकी बहन के जिस्म की खुशबू आनी थी।

थोड़ी देर के बाद वो वापिस आया और बाथरूम का बन्द दरवाजा खोल कर बोला- नहीं यार.. वहाँ पर कोई नहीं है.. दूसरी ब्रेजियर यहीं पड़ी हुई होगी।
मैंने कहा- अच्छा ठीक है.. मैं आकर देख लेती हूँ।

अभी भी उसकी हाथ में जाहिरा की ब्रा मौजूद थी.. जिसे देख कर मैं मुस्कराई और उसके हाथ से ब्रा को ले लिया। फिर मैं एक तौलिया अपनी नंगे जिस्म पर लपेट कर बाथरूम से बाहर लाउंज में ही निकल आई।
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फैजान दोबारा से सोफे पर बैठ कर टीवी देख रहा था। मैंने जैसे बेखयाली में वो जाहिरा की ब्रेजियर दोबारा से उसके पास ही सोफे पर फेंक दी और बोली- क्या है ना यार.. एक काम भी नहीं होता तुम से मेरा..
यह कह कर मैं अपने बेडरूम में चली गई, अपने कमरे से मैं दोबारा बाहर झाँक कर देखने लगी.. ऐसे कि फैजान मुझे ना देख पाए।

मैंने देखा कि फैजान ने एक-दो बार बेडरूम की तरफ देख कर मेरी तरफ से तसल्ली की और फिर अपने क़रीब ही सोफे पर पड़ी हुई अपनी बहन की ब्रेजियर को दोबारा से उठा लिया।

जैसे ही उसने उसे ब्रा को उठाया.. तो मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

फैजान ने दोबारा से अपनी बहन की ब्रेजियर उठा ली हुई थी और उस पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फेरते हुए उसे फील कर रहा था.. जैसे कि उसमें अपनी बहन की चूचियों को सोच रहा हो।

मैं कुछ देर उसे अपने बहन की ब्रेजियर से खेलती हुए देखती रही और फिर मुस्करा कर उसे ब्रा से एंजाय करते हुए छोड़ कर.. अपनी अल्मारी की तरफ बढ़ गई।

मैंने अपनी ब्रेजियर निकाल कर पहनी और फिर नीचे से एक लेग्गी पहन ली लेकिन ब्रा के ऊपर टॉप नहीं पहना और फिर बाहर आ गई।

जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला तो फैजान ने जाहिरा की ब्रा फ़ौरन ही सोफे पर फेंक दी। मैंने देख तो लिया था.. लेकिन शो ऐसे ही किया.. जैसे मैंने कुछ भी ना देखा हो।
फिर मैंने कपड़ों में से जाहिरा के कपड़े और सोफे पर से उसकी ब्रेजियर उठाई और उसकी अल्मारी में रख आई।

पहले तो फैजान थोड़ा सा घबराया था लेकिन जब उसने देखा कि उसकी इस हरकत का मुझे कुछ भी पता नहीं चला.. तो वो काफ़ी रिलेक्स हो गया था।
मैं तो खुद भी उसे अहसास करवा कर अपना काम और मज़ा खराब नहीं करना चाहती थी ना.. और उसे अपने ही बहन की तरफ जाने का पूरा-पूरा मौका देना चाहती थी।

दो दिन के बाद सुबह जब फैजान ऑफिस के लिए कमरे में ही तैयार हो रहा था.. तो मैंने उससे कहा- फैजान.. प्लीज़ आज ऑफिस से आते हुए थोड़ी शॉपिंग तो करते आना..
फैजान- क्या मंगवाना है?
मैं- यार 3-4 सैट लेटेस्ट और खूबसूरत डिज़ाइन वाली ब्रेजियर के तो ले ही आना।
फैजान- ओके डार्लिंग.. लेता आऊँगा।
मैं- ओह हाँ.. याद आया.. वो ना साइज़ तुम 34 इंच लेकर आना।

फैजान ने हैरान होकर मेरी तरफ देखते हुए बोला- क्यों.. 34 क्यों.. तुम्हारा साइज़ तो 36 है.. फिर छोटा नंबर क्यों मंगवा रही हो?

मैंने उसके उतारे हुए कपड़े समेटते हुए बड़े ही साधारण अंदाज़ में कहा- वो 34 की साइज़ की ब्रेजियर जाहिरा के लिए मंगवानी हैं ना.. उसकी ब्रा सबकी सब पुरानी हैं और पुरानी डिज़ाइन की हैं.. उसके लिए कुछ अच्छी डिज़ाइन की ब्रेजियर ले आना।
मैंने इतनी नॉर्मल अंदाज़ में कहा था.. जैसे कि उससे बाज़ार से कोई सब्ज़ी या घर की कोई और चीज़ मंगवा रही हूँ।

लेकिन मेरी इस बात से फैजान चकित हो चुका था। उसे इसे हालत में छोड़ कर मैं मुस्कराती हुई कमरे से बाहर आ गई और रसोई में जाकर नाश्ता तैयार करने लगी।
जब फैजान और जाहिरा भी नाश्ते के लिए आ गए.. तो हम सब नाश्ता करने लगे।

मैंने नोट किया कि आज फैजान बड़ी ही अजीब नज़रों से जाहिरा को देख रहा था। आज भी उसकी नजरें बार-बार उसकी चूचियों पर जा रही थीं.. जैसे कि वो खुद भी अपनी बहन की चूचियों की साइज़ का अंदाज़ा करना चाह रहा हो।
उसकी यह हालत देख कर मैं दिल ही दिल में मुस्करा रही थी।

इतने दिनों में अब यह तब्दीली आ चुकी हुई थी कि जाहिरा को भी कुछ-कुछ फील होने लगा था कि उसके भाई की नजरें उसके जिस्म की इर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं.. लेकिन वो भी कुछ बुरा फील नहीं करती थी और उस बात को साधारण सी बात ही समझती थी।
मैंने कभी भी उसे बुरा मानते हुए या खुद को छुपाते हुए नहीं देखा था।

हस्ब ए मामूल.. शाम को फैजान घर वापिस आया तो उसके हाथ में एक शॉपिंग बैग था। जिसे उसके हाथ में देख कर ही मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई। लेकिन मैंने अपनी मुस्कराहट फैजान से छुपा ली।

अपने कमरे में आकर फैजान ने मुझे वो शॉपिंग बैग दिया और बोला- यह ले आया हूँ.. जो तुमने मँगवाया था.. देख लेना और अगर कुछ चेंज-वेंज करना हो तो भी करवा लाऊँगा।

मैंने भी बड़े ही साधारण तरीके से उससे बैग लिया और उसे कमरे में एक तरफ ‘ओके’ कह कर रख दिया.. जैसे मुझे कोई ख़ास दिलचस्पी ना हो और यह एक आम सी बात ही हो।
लेकिन अन्दर से मैं बहुत उत्सुक थी कि देखूँ कि फैजान अपनी बहन के लिए किस किस्म की ब्रा सिलेक्ट करके लाया है।

अगले दिन जाहिरा घर पर ही थी तो फैजान के जाने के बाद मैंने वो शॉपिंग बैग उठाया और बाहर आ गई। जहाँ पर जाहिरा बैठी टीवी देख रही थी।
मेरे हाथ मैं नया शॉपिंग बैग देख कर खुश होती हुए बोली- वाउ भाभी.. शॉपिंग करके आई हो.. कब गई थीं आप.. और क्या लाई हो.. दिखाओ मुझे भी?
मैं मुस्करा कर बोली- नहीं यार मैं तो नहीं गई थी.. कुछ चीजें तुम्हारे भैया से ही मँगवाई हैं और वो भी तुम्हारे लिए..

मैं अब जाहिरा के पास ही बैठ चुकी थी और उसका भी पूरा ध्यान अब मेरी तरफ ही था।
जाहिरा- अरे भाभी मेरे लिए क्या मंगवा लिया है.. दिखाओ ना मुझे भी?
मैंने बैग मैं से चारों बॉक्स निकाल कर बाहर टेबल पर हम दोनों की सामने रख दिए। बॉक्स पर ब्रा पहने हुई मॉडल्स की फोटो थीं.. जिनको देखते ही जाहिरा चौंक उठी

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