पहली चुदाई में सील टूटी और गांड फटी -2

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अब तक आपने पढ़ा..
मैंने उसकी चूत पर अपना लण्ड लगा दिया कि पता ही नहीं चला पर उसे पता चल गया।
वो बोली- नहीं.. ये गलत है..
मैं बोला- क्या गलत है?
प्रेमा- यही सब.. जो हम कर रहे हैं और मैं ये केवल अपने पति के साथ करूँगी..
मैं- तो ठीक है.. मैं तेरा पति बनने के लिए तैयार हूँ।
मैंने उससे उसकी माँग में सिंदूर लगाया और उसकी मांग भर दी।
‘अब हम तेरे.. और तू हमारी.. अब ज्यादा ना नुकुर नहीं करना..’
पर वो अब भी नहीं मानी।
अब आगे..

मैंने समझाया- कुछ भी गलत नहीं है.. और तू मुझसे प्यार करती है न?
बोली- हाँ..
‘तो फिर क्यों गलत कह रही हो.. और डर क्यों रही है? साथ ही मुझे भी डरा रही है.. और किस बात का डर.. पर डर तो मुझे भी लग रहा है।’
वो- तुम्हें किस बात का डर.. तुम तो लड़के हो और सजा तो हमको भुगतनी पड़ेगी..
‘अच्छा तूने तो बड़ी पढ़ाई पढ़ ली.. नहीं मेरी जान तेरे साथ में भी सजा भुगत लूँगा..’ मैं बोला।
‘अच्छा.. क्या सजा भुगतोगे?’ उसने पूछा।
‘अरे यार इन बातों में मिलन का मजा किरकिरा मत करो.. अभी थोड़ी देर बाद बात करेंगें..’

मैं उसके साथ चूमा चाटी करने लग गया, कभी उसके स्तनों को दबाता.. तो कभी उसकी गर्दन पर चुम्बन करता।
इससे वो अन्तर्वासना की चरम सीमा पर पहुँच गई, मैंने हल्के से लण्ड को उसकी चूत पर लगाया.. उसके बदन में सिरहन सी दौड़ गई, बोली- मुझे जाड़ा लग रहा है।
मैंने कहा- अभी रुक.. गर्मी आती है।

और मैंने एक झटका लगाया.. मेरा लण्ड चूत की बगल को सरक गया और वो हँस पड़ी।
मैंने कहा- क्या हुआ?
वो बोली- बस..!
मैंने कहा- रुक.. अभी तू खुद कहेगी बस्स..स..स..

फिर मैंने दुबारा कोशिश की.. परन्तु नाकाम रहा.. थोड़ा अपने चूतड़ों को ऊपर उठकर लण्ड पर थूक लगाया.. एक हाथ से उसकी चूत की फांक को अलग करके लण्ड का टोपा उस पर टेक दिया।

वो कांप गई.. बोली- आ.. आह.. आ..आई आ.. मर गई मरी.. दर्द हो रहा है.. मैं.. मरी.. निकालो इसे.. नहीं तो मैं मर जाऊँगी.. दर्द हो रहा है.. मुझे नहीं करना..
और एक बिन पानी मछली की भाँति तड़पने लगी। वो नागिन की तरह बल खाने लग गई.. पूरी 90 डिग्री पर घूम गई.. बड़ी मुश्किल से शांत किया।

मैं बोला- थोड़ा दर्द तो होगा.. और तू प्यार करती है न मुझसे.?
‘नहीं.. मुझे प्यार-व्यार नहीं करना..’
अभी उसने इतना ही कहा था कि मैंने उसकी परवाह किए बिना ही एक तगड़ा झटका लगा दिया।
वो जोर से चीख पड़ी- ऊई माँ.. मरी.. न..नहीं.. मुझे नहीं करना.. प्लीज बाहर निकालो.. मैं मर जाऊँगी.. मैं मर जाऊँगी.. ओह्ह.. बहुत दर्द हो रहा है.. तुम मुझसे प्यार करते हो न.. प्लीज बाहर निकालो..
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मैंने कहा- ठीक है.. बाहर निकालता हूँ.. और मैं बजाए निकालने के धीरे-धीरे झटका देने लगा।
उसकी चूत इतनी कसी थी.. कि मैं ठीक से झटके भी नहीं दे पा रहा था, मेरे लण्ड में भी जलन सी हो रही थी.. पर फिर सोचा कि अगर अबके सोनू बाहर निकाल लिया.. तो फिर यह फिर नहीं चोदने देगी.. इसलिए मैं थोड़ी देर ऐसे ही पड़ा रहा।

वो कुछ शांत हुई.. मैंने उसके होंठों पर होंठ रख दिए और धीरे-धीरे चूतड़ों को ऊपर-नीचे करने लगा।
वो फिर छटपटाने लगी और छूटने की कोशिश करने लगी.. पर उसकी गर्दन अपने हाथों में ऐसे फंसा ली थी कि वो छूट ही नहीं सकती थी।
वो दर्द के मारे कराहने लगी- आहह.. मरी.. मरी.. मरी.. ऊई माँ..

उसकी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे के नीचे ही रह गईं पर मैं तो चुदाई के आवेश में था.. तो उसके दर्द की परवाह किए बगैर.. मैंने एक झटका और मारा और अबकी बार मेरा आधा लण्ड उसकी चूत में जा चुका था।

अभी साला आधा सोनू ही अन्दर गया था और उसके दर्द के मारे प्राण गले में आ गए थे.. मेरा आधा लण्ड अभी भी बाहर था और उसकी तो आधे ही लण्ड में दम सी निकल गई, एकदम साँस ऊपर खींच गई और उसकी सारी चीखें.. सीत्कारें.. बंद हो गईं।

मैंने सोचा कि शायद मर ही गई है.. क्योंकि वो हाथ-पैर फैला गई थी, जो अभी तक छूटने की कोशिश कर रही थी अब हाथ पैर एकदम ढीले छोड़ दिए.. जैसे हाथ पैरों से जान ही निकल गई हो।
पर थोड़ी देर बाद अपनी कुनमुनाती आवाज में ‘आह..आह..’ की आवाज से अपनी माँ को याद करने लगी।
मैंने सोचा कि अभी तो जान है.. और कुछ नहीं हुआ।

मैंने सुना भी था कि लड़की तो गधे के लण्ड को भी ले ले.. और मेरा तो गधे से तो छोटा ही था.. तो कहीं नहीं मरेगी। बस मैंने एक और झटका मारा और एक ‘जोर’ की आवाज आई ‘आह हा..हह ह..’
उसके मुँह से एक तेज चीख निकल गई.. बहुत जोर से कमरा गूँज उठा, सोचा अब तो चूत फट गई।

फिर वो अपनी माँ को भी भूल गई और बेहोश हो गई.. मैं ‘दे दनादन..’ उसे चोदने लगा.. पर लण्ड पूरी तरह से उसकी चूत में नहीं समाया था। मैं धक्का देने की कोशिश करूँ.. पर अन्दर न जाए क्योंकि लण्ड उसके गर्भाशय से टकरा रहा था इसलिए मैंने ज्यादा अन्दर डालना उचित नहीं समझा.. कहीं ऐसा न हो कि गर्भाशय ही फट जाए.. पर अभी भी मेरा 2 इंच के करीब लण्ड बाहर था। और थोड़ा तीखा होकर मैंने झटके देना शुरू कर दिए और उसकी ‘अहा..ऊ.. अहा ऊ..’ की आवाजें आने लगीं।

मैं इतना हचक कर चोदा और ऐसा नशा चढ़ा कि यह पता ही नहीं पड़ा कि वो बेहोश हो चुकी है। सब कुछ भूल कर मैं उस चरमोत्कर्ष पर पहुँचना चाहता था।

करीब 7-8 मिनट बाद उस स्थिति पर भी पहुँच गया और वीर्य स्खलन की स्थिति होने पर मेरी रफ़्तार स्वत: ही बढ़ गई।
अब मुझे उसके दर्द से नहीं.. अपने मजे से आनन्द आने लगा था..

थोड़ी देर बाद मेरा भी वीर्य निकल गया और मैं उसी के ऊपर लेट गया। जब मैं उस पर से हटा तो वो बेहोश थी.. मेरे तो होश-फाख्ता हो गए.. कि कहीं मर तो नहीं गई। मैंने उसे होश में लाने के लिए हल्के हाथ से उसके गाल पर थप्पड़ मारे.. पर कोई फायदा नहीं हुआ। मैं तो घबरा गया और उसके हाथ-पैर की मालिश करने लगा.. पर कोई फायदा नहीं हो रहा था।

मैंने ऊपर वाले को याद किया.. पर लगा कि वो क्या उसे उठाने आ रहे हैं? मैंने फिर सोचा कहीं मर तो नहीं गई और उसकी गर्दन पर हाथ रख कर देखा.. नब्ज तो चल रही थी.. और उसकी सांस भी चल चल रही थी। तब जाकर जान में जान आई।

फिर मैंने सोचा कि किसे बुला कर लाऊँ और मैं तो इसके घर में हूँ.. अगर बाहर जाता हूँ तो.. इसे ऐसी हालत में छोड़ भी नहीं सकता। फिर मैंने दिया जलाया तो मेरे तो होश ही उड़ गए ये देखकर कि उस दरी पर जिस पर हम लेटे थे.. जिस पर हमने सम्भोग किया था.. उधर खून ही खून था। उसके सारे कपड़े खून में लथपथ थे.. मेरी भी चड्डी खून से सनी हुई थी।

मैंने उसी की सलवार से उसकी खून से सनी कमर.. और जांघ को साफ़ किया और उसे होश में लाने की कोशिश करने लगा.. पर वो होश में नहीं आई। मैंने ऐसी ही अवस्था में उसे दूसरे कपड़े पहनाए और उसे उठाने की कोशिश करने लगा.. पर वो नहीं उठी।

अब मैं क्या करूँ और मैंने इधर-उधर पानी की तलाश की.. तो अन्दर मटका रखा हुआ था। उसके मुँह पर पानी के छीटें दिए.. तो तो वो हल्के से ‘आह.. ऊ..’ करने लगी और उसे होश आ गया। मैंने सहारा देकर उसे उठाया.. तो उस पर खड़ा नहीं हुआ गया। मैंने सहारा देकर उसे खड़ा किया.. पर वो गिर पड़ी। उसे चक्कर आ रहे थे।

मैं भी वहीं बैठ गया और मैंने इधर-उधर देखा तो सारे कपड़े खून में सने हुए दिखे। उसने भी खून देखा तो वहीं बैठ कर रोने लगी।
मैंने बहुत चुप कराया.. पर वो चुप नहीं हुई, बोली- तूने मुझे कहीं की भी नहीं छोड़ा.. मैंने मना भी किया था कि मत करो.. मत करो.. यह गलत है.. अब क्या कहेगें लोग-बाग.. अब तो मेरे लिए कहीं भी ठौर नहीं है.. अब मैं क्या करूँ?

अब मुझे भी आंसू आने लगे..
वो बोली- तुम क्यों रो रहे हो.. मरना तो मुझे है।
मैं बोला- जब तुम्हारे लिए ठौर नहीं.. तो मुझे कहाँ जगह मिलेगी।

इस प्रकार बातचीत करते हुए बहुत देर हो गई और करीब 12 बजे मैं अपने घर आ गया।
दूसरे दिन उसका फोन आया.. वो बोली- मुझसे उठा न जा रहा है और सारे कपड़े खून से सन रहे हैं.. बड़ी मुश्किल से धोये हैं और मुझे चक्कर आ रहे हैं। अब मैं क्या करूँ..? मम्मी भी पूछ रही थीं कि लाली लंगड़ा कर कैसे चल रही है। मैंने बोल दिया है पाँव रपट गया था.. और जब उन्होंने पूछा कि ये दरी क्यों धोई..? तो मैंने कह दिया कि गन्दी हो गई थी।

उससे इसी तरह की बस दो-चार बात कर के मैंने फोन रख दिया।

उसके बाद हम अक्सर मिलते रहे और पर सम्भोग की न तो मैंने कही.. और न ही उसने.. क्योंकि उस दिन से उसे भी डर लग गया और मुझे भी।

करीब 2 माह बाद दूसरी बार सेक्स किया.. वो किस प्रकार किया.. ये घटना अगली कहानी में लिखूँगा।
आज तक मुझे कोई वैसी लड़की नहीं मिली.. मैं शादी के लिए 30 के करीब लड़की देख चुका हूँ.. पर कोई भी पसंद नहीं आ रही है.. इसलिए अभी तक कुंवारा हूँ.. कुँवारा मतलब.. बिना शादी के हूँ। सरकारी नौकरी है.. खूब पैसा है.. पर कोई वैसी लड़की नहीं मिली है।

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